2/21/2008

साला कुत्ता समाज, ठीक कहा तसलीमा तूने....


फूलों की तरह सुंदर और पवित्र, यह उपमा अक्सर औरत के लिए प्रयोग में आती है. जो लड़की पुरुषों की तरफ आंख उठा कर नहीं देखती, छत पर नहीं जाती, कम हंसती हैं, पहनावे में सलीका, चलने फिरने में मंथर, धीमा कंठ में स्वर हो तो आम तौर पर उस लड़की को इस समाज में फूलों की तरह सुंदर और पवित्र कहा जाता है. पवित्रता का अर्थ है कि स्त्री को कोई पुरुष स्पर्श न करे, उसका कौमार्य भंग ना हुआ हो, विशेषकर किसी गैर मर्द द्वारा...
फूल की उपमा कभी किसी पुरुष को नहीं दी जाती है, सिर्फ स्त्री ही ओढ़कर बैठी है दुनिया के सारे फूलों का लबादा. फूल सुंदर होता है, सुगंध बिखेरता है और ठीक इसी तरह स्त्री को भी विभिन्न रंगों का होना पड़ता है. अगर वो ऐसी नहीं होगी तो ये समाज उसे नोच नोच कर, मसल कर फेंक देगा. गुलाब की पंखुड़ियों की तरह होंठ, भौंरे की तरह काली आंखे, गुलाबी गाल, घने काले रेशमी बाल, दूध और आलता मिश्रित या कच्ची हल्दी जैसी त्वचा, मोतियां की तरह सफेद दांत. लड़कियों की त्वचा और बालों से भीनी-भीनी खुशबू ना निकलने से लड़कियां शोभा नहीं देती. इसलिए घिस-मलकर बदन की दुर्गंध दूर करने के लिए प्रतिदिन नये नये साबुन बन रहे हैं. उन साबुनों से कोमल रमणियों के सौंदर्य की रक्षा करने का विज्ञापन भी दिया जा रहा है. विभिन्न तरह की सुगंधों से यह बाजार भर गया है. एक औरत को फूल की तरह सुंदर बनाने के लिए इतना जतन क्यों? ताकि मनुष्य रूपी पुरुष, फूल रूपी स्त्री की सुगंध लेता रहे और उसके विभिन्न रंगों में मुग्ध होता रहे? जिस प्रकार फूल किसी के तोड़े जाने पर मुर्झा जाता है, सूख जाता है, मर जाता है, ठीक उसी प्रकार किसी भी गैर पुरुष के छुए जाने पर स्त्री की पवित्रता मुरझा जाती है. वह समाज की नजरों में एक गंदी औरत घोषित हो जाती है. हमारे समाज में स्त्री वह सुगंधित पदार्थ है- जो एक ही साथ वर्ण और गंध से पुरुष को मुग्ध करती है, मोहित करती है, तुष्ट करती है और तृप्त करती है. क्या शरीर का सिर्फ एक ही हिस्सा उसके अच्छे बुरे की पहचान कराने के लिए काफी है. नहीं. बिल्कुल नहीं.
आज तक किसी पुरुष को इस तरह रंग, गंधयुक्त उपमा से अलंकृत नहीं किया गया. आज तक किसी स्त्री चित्रकार या मूर्तिकार ने पुरुष के शरीर को उस प्रकार विभिन्न भंगिमाओं में, रंगों और रेखाओं में अभिव्यक्त नहीं किया, जिस प्रकार पुरुष चित्रकारों और मूतिर्कारों ने स्त्री शरीर को लेकर तरह तरह की कल्पनाएं गढ़ीं. क्यों नहीं आज तक किसी स्त्री कवि या कथाकार ने पुरुष शरीर के अंगों प्रत्यंगों का वैसा लोभनीय वर्णन नहीं किया, जिस तरह पुरुष कवि या कथाकारों ने स्त्री के शरीर को लेकर किया? ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण कुछ कम है, बल्कि सिर्फ इसलिए क्योंकि यह एक स्त्री के लिए शर्मनाक विषय होगा, जो स्त्री को मोहमयी कर देगा. ये हमारे समाज का ढांचा है, जबकि ऐसा करने में कोई बुराई नहीं.
पुरुष के बाल, बाहु, वक्ष, नितंब देखकर नारी भी मुग्ध होती है, जिस प्रकार स्त्री के कुछ अंग पुरुषों की मुग्धता और कामना के कारण हैं. लेकिन स्त्री के मुग्ध भाव की कोई स्वतंत्र अभिव्यक्ति नहीं है- न हमारे इस बदबूदार समाज में और ना ही औरत को भोग की वस्तु मानने वाले इन साहित्यों में. शादी में लड़के के रिश्तेदार अच्छी तरह जांच परख कर लड़की लाते हैं. लड़ाका उसके रंग, दांत, बाल, आंखों, कद-काठी, कमर, नितंब, छाती सभी पर अपनी नजरें गड़ा गड़ा कर देखता. लेकिन लड़के को जांचने का नियम हमारे इस समाज में नहीं. इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि लड़के का शरीर किसी लड़की के लिए महत्वपूर्ण विषय नहीं. यह भी वह शर्मनाक विषय है, जो स्त्री नाम की एक बेहूदी चर्चा है. लड़की जन्म से ही स्त्री नहीं होती, हमारे समाज के बजबजाते नियम, कायदे व कानून उसे स्त्री बना देते हैं और उसकी पहचान सिर्फ बेटी, बहन, पत्नी और मां के रूप में होने लगती है.
फूल और फल के साथ स्त्री के अंगों की तुलना होती है. फूल और फल की उम्र बहुत कम होती है, सूंघने और खाने के बाद दोनों कूड़ेदान में फेंक दिये जाते हैं, उसी तरह स्त्री भी. स्त्री को खा-पीकर जूठन की तरह फेंक दिया जाता है. औरत चाहे जितनी भी बोल्ड, जितना भी पैसा क्यों न कमाती हो, लेकिन इस समाज में कोई ना कोई ऐसा पुरुष जरूर होता है जो उस पर अपना जन्मजात अधिकार समझता है, मानो वह उस साले के बाप की बपौती हो. यह समझाने के लिए मनुष्य नामक पुरुष को भी उसी कतार में उतार कर उसे भी फूल की उपमा देनी होगी या फिर औरत को अपने भीतर से शरीर के उस एक हिस्से का मोह छोड़ना होगा, जिसके होने से वह खुद को स्त्री समझती है. वह मोह ही उसे स्त्री बनाता है और वही मोह एक पुरुष को उस पर शासन करना सिखाता है.
जब औरत नरक का द्वार है, तो उसके कौमार्य की इतनी परवाह क्यों. जब औरत तुम पुरुषों से कोई सवाल नहीं करती, तो तुम क्यों जबरदस्ती उसके फटे में टांग अड़ाते हो?

8 comments:

Anonymous said...

sundar aur sach likha aapne.

kirti, delhi

मोहिन्दर कुमार said...

लेखा जी

पहली बार आपके ब्लाग पर आया... सुन्दर ब्लाग है आपका साथ ही आपके बिचारों की आग आपकी कलम में झलकती है... अच्छा लगा आपका बेबाकीपन और खुलेपन से लिखना.. स्त्रियां क्या पुरूष भी सच कहने और लिखने से परहेज करते हैं.

आपने अपने लेख में स्त्री की सुन्दरता के विषय में और उसके प्रति पुरुषों की मानसिकता के बारे में लिखा है.. परन्तु क्या सच में शारीरिक सुन्दरता का उतना महत्व है और क्या सब पुरूष एक समान है... समाचार पत्र में एक बलात्कार का समाचार पढ कर पूरे पुरूष समाज को दोषी ठहराना कहां तक उचित है... नारी को सरक्षण देते - पिता, भाई व दोस्त पुरूष नहीं हैं क्या...

मैं पुरूषों का बचाव नहीं कर रहा बस यह कहना चाह रहा हूं कि लेखन में सन्तुलन आवश्यक है. विचार प्रवाह में बह कर लेख भटक सकता है..
यह मेरा तर्क है.. हो सकता है गलत भी हो.. अगर आप को बुरा लगे तो क्षमा कीजियेगा..
अब आना जाना लगा रहेगा.. इस गंदी लडकी का लिखा पढने के लिये... :)

कृष्ण said...

जीवन की इतनी परतें है कि उसे एकबारगी समझना मुश्किल है...

आशा है मित्र, तुम्हारी ये धार अनवरत बरकरार रहेगी... जिंदगी के आने वाले बरसों में भी... पर आशंका है कि क्या ऐसा हो पाएगा... क्या रह पाओगी तुम वैसी है जैसी हो... जो ऐसा नही हुआ तो धोखा होगा तुम्हारा ही तुमसे... विनती है मित्र ऐसा होने मत देना...

कि जरूरत इस आग के बरकरार रखने की है... पर जितना... पढ़ा... देखा... सुना....जाना है तो लगता है भावनाएं, विचार क्षणिक होते हैं अस्थाई.... कई बार तो व्यक्तित्व भी स्थाई नहीं होता।

वक्त के मोड़ पर अचानक सबकुछ बदल जाता है कभी कभी तो एकदम ही यूटर्न...


फिर क्या फायदा

मित्र, तुम ऐसा मत होने देना...

और क्या बुरा है जो स्त्री योनि और स्तन है, पुरुष भी तो शिश्न से ज्यादा कुछ नहीं

क्या ये कामना स्वभाविक, कुदरती नहीं है...
जो है तो इसमें बुरा क्या...
हां...ये अभिव्यक्ति दोतरफा होनी चाहिए...

तो बदल रहा है वो सबकुछ भी...

जितनी भी सेक्स फिल्में, एमएमएस देखों क्या लगता नहीं है स्त्रियां अभिव्यक्ति में बेबाक हो रही है,
वो हो रही हैं... होंगी...

क्योंकि यहीं स्वभाविक है, नैचुरल...

और फिल्मे क्या, तुम्हारे सूअरों से भी पूछो तो वो भी यही कहेंगे कि उन्हें भी तभी मजा आता है जब उनकी केलिसखी उन्हें देख मदमस्त हो जाती है और अपनी इस दशा की अभिव्यक्ति भावों से करती हैं...

बस, हो तो रहा है बदलाव...

लेकिन इसका कोई शॉर्टकट नहीं... जो समय इस बदलाव के पूर्णरूपेण होने में लगना है, वो तो लगेगा ही... पर चीजें बदल रही अपनी रफ्तार से...

कृष्ण

Anonymous said...

Keep fucking these bastards like this... Keep it up

संदीप द्विवेदी said...

लाजवाब......बिंदास......कोई ज़ोर नही....तसलीमा नसरीन के बाद पहले बार किसी महिला के बेबाक विचार पढने को मिले हैं..

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सच के बेहद करीब।
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करे कोई, भरे कोई?
इंटेलिजेन्ट ब्लॉगर्स से एक सवाल।

Anonymous said...

""इसलिए घिस-मलकर बदन की दुर्गंध दूर करने के लिए प्रतिदिन नये नये साबुन बन रहे हैं. उन साबुनों से कोमल रमणियों के सौंदर्य की रक्षा करने का विज्ञापन भी दिया जा रहा है. विभिन्न तरह की सुगंधों से यह बाजार भर गया है. एक औरत को फूल की तरह सुंदर बनाने के लिए इतना जतन क्यों? ""
Gandi behan mai b aap k jaisi hi gandi vichar vaali behan hun, par upar wali lines me aapne jo likha hai uske liye apni kuchh nangi behne jimmedar nahi hai kya ? q wo saabuno k vigyapan k liye nangi hoti hain badh-chadh k ? or to or cycle, motorcycle, jents ganji-janghiye k liye b apni behne nangi ho jati hai?

lokesh mishra said...

आप का पोस्ट पढकर अच्छा लगा आप एक खुले मिजाज की गंदी लडकी है आपने दुनिया की बेहद सच्ची सच्चाई को बताया है यह पढकर मुझे अच्छा लगा पर आपने केवल लडकियो का बचाव बहुत किया है अक्सर इन मामलों में लडकियो की भूमिका अहम होती है तभी ऐसी धटनाए लडको के द्वारा होती है मै किसी का सपोर्ट नहीं करता ऐसे ही पोस्ट लिखती रहो मै फिर आऊगा प्यारी गंदी लडकी का पोस्ट पढने के लिए....